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भारत-चीन संबंध : बहुत कठिन है डगर...
सत्यनारायण गुप्ता
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यदि सर्वसम्मति से घोषणापत्र जारी होना सफलता का मानक है तो 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को सफल कहा जा सकता है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद के बावजूद सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणा जारी हुई।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव, ईरान और पश्चिमी देशों के बीच टकराव तथा वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों के बीच यह सहमति अपने आप में महत्वपूर्ण है। लेकिन भारत के लिए इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद ब्रिक्स घोषणा-पत्र से भी आगे की है- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बहुप्रतीक्षित शिखर बैठक। अंतिम समय तक इस बात को लेकर अटकलें थीं कि शी जिनपिंग भारत आएंगे अथवा नहीं।
अंततः वे नई दिल्ली पहुंचे, ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता की। 2019 के बाद उनकी यह पहली भारत यात्रा थी। बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह था कि दोनों देश अपने मतभेदों को विवाद का रूप नहीं लेने देंगे। दोनों नेताओं ने अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई मुलाकात के बाद भारत-चीन संबंधों में हुई स्थिर प्रगति का स्वागत किया। प्रधानमंत्री मोदी ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता को द्विपक्षीय संबंधों के निरंतर विकास की आवश्यक आधारशिला बताया।
उन्होंने पारस्परिक सम्मान, पारस्परिक संवेदनशीलता और पारस्परिक हित पर आधारित संबंधों की आवश्यकता पर भी जोर दिया। चीनी पक्ष के अनुसार शी जिनपिंग ने भारत-चीन संबंधों के दीर्घकालीन और स्थिर विकास के लिए चार सूत्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इसमें दोनों देशों के बीच रणनीतिक समझ, पारस्परिक लाभ के आधार पर सहयोग तथा संयुक्त राष्ट्र, ब्रिक्स और जी-20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।
चीन ने भारत और चीन को अलग-अलग सभ्यताओं और राष्ट्रीय परिस्थितियों वाले दो बड़े देशों के रूप में एक-दूसरे की ताकत से सीखने की बात कही है।ब्रिक्स के समापन सत्र में चीनी राष्ट्रपति की उपस्थिति में प्रधानमंत्री मोदी की यह टिप्पणी कि तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स को हथियार बनाने की प्रवृत्ति साझा प्रगति और समृद्धि में बाधा बन सकती है, काफी महत्वपूर्ण है।
लेकिन इन राजनयिक शब्दों की असली परीक्षा जमीन पर होगी। भारत-चीन संबंधों का इतिहास बताता है कि दोनों देशों के बीच सौहार्द और अविश्वास साथ-साथ चलते रहे हैं। अक्टूबर 1949 में चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई। भारत ने इसका स्वागत किया और वह गैर-साम्यवादी दुनिया का पहला देश था जिसने साम्यवादी चीन को राजनयिक मान्यता दी। कोरियाई युद्ध के दौरान भी भारत ने चीन के साथ संवाद बनाए रखने और संयुक्त राष्ट्र में उसे उचित स्थान दिलाने का प्रयास किया।
1954 में भारत और चीन के बीच तिब्बत को लेकर समझौता हुआ और पंचशील के सिद्धांत सामने आए। भारत ने तिब्बत पर चीनी प्रभुसत्ता को स्वीकार किया। तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना को रेखांकित करते हुए कहा था कि अलग-अलग सामाजिक व्यवस्थाओं वाले देश भी शांतिपूर्ण ढंग से साथ रह सकते हैं। 1955 के बांडुंग सम्मेलन में भारत और चीन का सहयोग दिखाई दिया। गोवा के प्रश्न पर भी चीन ने भारत का समर्थन किया। यह भारत-चीन संबंधों का वह दौर था जिसे बाद में दोनों देशों के संबंधों का हनीमून काल कहा गया।
लेकिन यह दौर बहुत लंबा नहीं चला। 1959 के बाद सीमा पर चीनी गतिविधियां और तनाव बढ़ने लगे और अक्टूबर 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ। बेहतर सैन्य तैयारी और भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए चीन ने भारतीय सेना को भारी क्षति पहुंचाई। नवंबर 1962 में चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी। 1962 का युद्ध भारतीय मानस में चीन के प्रति अविश्वास की एक स्थायी स्मृति छोड़ गया।
1970 के दशक में दोनों देशों के संबंधों में धीरे-धीरे सुधार शुरू हुआ। राजनयिक संबंधों को पुनर्जीवित किया गया और व्यापारिक संपर्क बढ़े। 1979 में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन की यात्रा पर गए, लेकिन उसी दौरान चीन द्वारा वियतनाम पर आक्रमण किए जाने के कारण उन्होंने अपनी यात्रा बीच में ही समाप्त कर दी। 1981 में चीनी विदेश मंत्री की भारत यात्रा ने सीमा विवाद पर बातचीत का रास्ता फिर खोला।
इसके बाद लंबे समय तक दोनों देशों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव के बावजूद संवाद चलता रहा। सीमा विवाद, अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे और पाकिस्तान को चीन की सैन्य सहायता जैसे मुद्दे तनाव पैदा करते रहे, लेकिन दूसरी ओर आर्थिक संबंध लगातार मजबूत होते गए। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी दोनों देशों ने संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश की। शी जिनपिंग ने 2014, 2016 और 2019 में भारत की यात्रा की।
मोदी और शी की व्यक्तिगत मुलाकातों ने यह उम्मीद पैदा की कि दोनों नेता कठिन संबंधों को नई दिशा दे सकते हैं। गुजरात और महाबलीपुरम की अनौपचारिक बैठकों ने दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत संवाद और राजनीतिक समझ की तस्वीर भी प्रस्तुत की। लेकिन 2017 में डोकलाम और फिर 2020 के गलवान संघर्ष ने इस उम्मीद को बड़ा झटका दिया। गलवान की हिंसक घटना ने दोनों देशों के बीच विश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
इसके बाद सीमा पर लंबे समय तक सैनिकों की भारी तैनाती रही और द्विपक्षीय संबंधों में लगभग ठहराव आ गया। फिर भी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां लगातार बदल रही थीं। 2024 में कजान में ब्रिक्स सम्मेलन और 2025 में तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन के दौरान मोदी और शी की मुलाकातों ने संकेत दिया कि दोनों देश पूर्ण टकराव के रास्ते पर नहीं जाना चाहते।
सीमा पर सैनिकों की तैनाती में कमी और सैन्य कमांडर स्तर की बातचीत ने भी तनाव कम करने में भूमिका निभाई। अब 2026 का नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन इस क्रम में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। मोदी-शी बैठक में दोनों नेताओं का यह मानना कि मतभेदों को विवाद नहीं बनने देना चाहिए, एक छोटा-सा वाक्य जरूर है, लेकिन भारत-चीन संबंधों के वर्तमान संदर्भ में इसका महत्व काफी बड़ा है।
खासकर इसलिए कि दोनों देशों के बीच अभी भी सीमा विवाद का स्थायी समाधान नहीं हुआ है। भारत चीन के साथ तीन हजार किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा (एल ए सी)साझा करता है। भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंधों का आकार भी दोनों देशों को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग होने की अनुमति नहीं देता। द्विपक्षीय व्यापार 150 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है, लेकिन व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में भारी है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, रसायन और अनेक औद्योगिक कच्चे माल तथा महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भारत की चीनी आयात पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती है। इसलिए राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक संबंधों को पूरी तरह तोड़ना व्यावहारिक विकल्प नहीं है। यहीं से वर्तमान भारत-चीन संबंधों की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है- दोनों देश एक-दूसरे के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हैं और महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार भी।
दूसरी ओर अमेरिका की बदलती व्यापार नीति ने भी वैश्विक समीकरणों को प्रभावित किया है। ट्रंप प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियों और टैरिफ के दबाव ने भारत सहित अनेक देशों को अपने आर्थिक विकल्पों पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया है। हालांकि भारत-अमेरिका संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं- फरवरी 2026 में दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा भी घोषित किया था- फिर भी अमेरिकी नीतियों की अनिश्चितता ने भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय विकल्पों के महत्व को बढ़ाया है।
यही वह परिस्थिति है जिसमें भारत और चीन के बीच संवाद की नई कोशिशों को समझना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ने चीन पर भरोसा करना शुरू कर दिया है या सीमा विवाद समाप्त हो गया है। बल्कि यह अधिक व्यावहारिक कूटनीति है- जहां प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों साथ-साथ चलेंगे। भारत के लिए चीन के साथ संबंधों में तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण होंगी- सीमा पर शांति, व्यापार में संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता।
चीन के लिए भी भारत को केवल एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखना उसके दीर्घकालीन हित में नहीं होगा। दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देशों और दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच स्थायी टकराव एशिया और विश्व, दोनों के हित में नहीं है। लेकिन इतिहास भारत को सावधान भी करता है। 1954 का पंचशील, 1955 का बांडुंग और उसके बाद 1962 का युद्ध यह बताता है कि केवल उच्चस्तरीय घोषणाएं संबंधों में स्थायित्व की गारंटी नहीं होतीं।
2020 का गलवान भी यही याद दिलाता है कि सीमा पर विश्वास और शांति के बिना कोई भी आर्थिक या राजनीतिक सामान्यीकरण अधूरा रहेगा। इसलिए नई दिल्ली में मोदी-शी की मुलाकात को न तो बहुत बड़ी कूटनीतिक विजय के रूप में देखने की जरूरत है और न ही महज औपचारिक मुलाकात मानकर खारिज करने की। इसे एक सावधान शुरुआत के रूप में देखना अधिक उचित होगा।