- हिंदी दिवस पर विशेष
डॉ. दीपक प्रसाद
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, विचार और आत्मसम्मान की पहचान होती है। हर वर्ष 14 सितंबर को देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में हिंदी के महत्व पर चर्चा होती है। प्रतियोगिताएं होती हैं, भाषण दिए जाते हैं और हिंदी के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। लेकिन एक गंभीर प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है कि क्या हिंदी को केवल एक दिन याद करने से उसका भविष्य सुरक्षित हो जायेगा?
यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि हम ऐसे समय में प्रवेश कर चुके हैं, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) हमारी जिंदगी के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, व्यापार से लेकर प्रशासन, बैंकिंग से लेकर कृषि और मनोरंजन से लेकर शोध तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेजी से अपना विस्तार कर रही है। ऐसे समय में हिंदी के सामने चुनौती भी है और एक अभूतपूर्व अवसर भी।
भारत की संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी निर्धारित की गयी है। यह समझना आवश्यक है कि हिंदी दिवस का उद्देश्य केवल हिंदी का उत्सव मनाना नहीं है।
इसका वास्तविक उद्देश्य हिंदी के प्रयोग, विकास और सम्मान को बढ़ाना है। लेकिन 14 सितंबर आते ही यदि हम हिंदी की प्रशंसा करें और 15 सितंबर से फिर उसी भाषा को पीछे छोड़ दें, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारी भाषा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता कितनी वास्तविक है? सवाल उठता है कि हिंदी का संघर्ष आखिर किससे है? यहां बताते चलें कि हिंदी का संघर्ष अंग्रेजी से कम और हमारी मानसिकता से अधिक है।
अंग्रेजी सीखना या बोलना कोई समस्या नहीं है। किसी भी विदेशी भाषा का ज्ञान व्यक्ति की क्षमता बढ़ाता है। समस्या तब पैदा होती है जब अंग्रेजी को ज्ञान, योग्यता और प्रतिष्ठा का प्रमाण मान लिया जाता है तथा हिंदी या भारतीय भाषाओं में बोलने वाले व्यक्ति को कमतर समझा जाने लगता है। आज हमारे समाज में कई बार ऐसा दृश्य दिखाई देता है कि कोई व्यक्ति हिंदी में सहजता से बोलता है तो उसे सामान्य समझा जाता है, लेकिन वही व्यक्ति कुछ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर दे तो उसके व्यक्तित्व को अधिक आधुनिक और शिक्षित मान लिया जाता है।
यह मानसिकता केवल शहरों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों तक पहुंच चुका है। कई बच्चे हिंदी में प्रश्न पूछने में संकोच करते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं दूसरे विद्यार्थी उन्हें कम बुद्धिमान न समझ लें। कई अभिभावक भी यह मानने लगे हैं कि अंग्रेजी माध्यम ही सफलता का रास्ता है। यह सोच बदलनी होगी। भाषा बुद्धिमत्ता का प्रमाण नहीं होती।
भाषा बुद्धिमत्ता को व्यक्त करने का माध्यम होती है। जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और जर्मनी जैसे अनेक देशों ने अपनी भाषाओं को आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था से जोड़े रखा है। उन्होंने विदेशी भाषाओं से दूरी नहीं बनायी, लेकिन अपनी भाषा को विकास की धुरी से हटने भी नहीं दिया। भारत को भी यही संतुलन सीखना होगा। क्या हिंदी विज्ञान और तकनीक की भाषा बन सकती है?
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है। इसका उत्तर है—हां, लेकिन इसके लिए केवल भावनात्मक प्रेम पर्याप्त नहीं है। हिंदी को विज्ञान, चिकित्सा, कानून, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कंप्यूटर, अंतरिक्ष विज्ञान और आधुनिक तकनीक की भाषा बनाना होगा। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री तैयार करनी होगी, नए शब्दों का सहज विकास करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात- हिंदी में ज्ञान का विशाल डिजिटल भंडार तैयार करना होगा। यहीं से कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी के लिए एक बड़ी संभावना बनकर सामने आती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज भाषा की सीमाओं को तेजी से बदल रही है। कुछ वर्ष पहले यदि किसी व्यक्ति को अंग्रेजी में कोई जानकारी चाहिए होती थी और वह अंग्रेजी नहीं जानता था, तो उसके सामने बड़ी बाधा होती थी। आज अक आधारित भाषा तकनीक अनुवाद, आवाज पहचान, पाठ निर्माण, सारांश, प्रश्नोत्तर और संवाद जैसे अनेक कार्यों में सहायता कर सकती है। कल्पना कीजिए कि गांव का एक किसान अपनी स्थानीय बोली में मोबाइल से पूछता है मेरी फसल में यह बीमारी क्यों हो रही है?
यदि AI उसकी भाषा या बोली को समझकर सरल हिंदी में समाधान दे सके और जरूरत पड़ने पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की जानकारी उपलब्ध करा सके, तो तकनीक वास्तव में समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही होगी। यही अक की सबसे बड़ी ताकत हो सकती है- ज्ञान को भाषा की दीवार से मुक्त करना। शिक्षा के क्षेत्र में अक हिंदी के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। एक विद्यार्थी हिंदी में प्रश्न पूछकर गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल या किसी अन्य विषय को अपनी समझ के स्तर पर समझ सकता है। कठिन अंग्रेजी पाठ का सरल हिंदी में अर्थ समझ सकता है।
शिक्षक अपनी कक्षा के लिए हिंदी में शिक्षण सामग्री, प्रश्नपत्र, गतिविधियां और उदाहरण तैयार कर सकता है। ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। लेकिन यहां एक सावधानी भी आवश्यक है। अक शिक्षक का विकल्प नहीं, शिक्षक का सहयोगी होना चाहिए। विद्यार्थी यदि हर प्रश्न का उत्तर बिना सोचे अक से लेने लगेगा, तो उसकी मौलिक सोच कमजोर हो सकती है। इसलिए अक का उपयोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए हो, सोचने की क्षमता समाप्त करने के लिए नहीं।
भारत की बड़ी आबादी अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को अंग्रेजी में व्यक्त नहीं कर पाती। यदि अक आधारित स्वास्थ्य सेवाएं हिंदी और भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होती हैं तो सामान्य व्यक्ति बीमारी, दवा, जांच, खान-पान और स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जानकारी को अधिक आसानी से समझ सकता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपनी समस्या बोलकर बता सके और अक उसे सरल भाषा में यह समझा सके कि उसे तत्काल डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए या सामान्य सावधानी बरतनी चाहिए। लेकिन यहां भी एक सीमा स्पष्ट है- एआई चिकित्सा विशेषज्ञ का विकल्प नहीं है।
गंभीर बीमारी, आपातकाल या दवा संबंधी निर्णय में योग्य चिकित्सक की सलाह आवश्यक रहेगी। भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों से जुड़ा है जिनकी पहली भाषा अंग्रेजी नहीं है। छोटे व्यापारी, किसान, कारीगर, घरेलू उद्यमी, स्वयं सहायता समूह और ग्रामीण युवा यदि अपनी भाषा में डिजिटल तकनीक का उपयोग कर सकें तो आर्थिक भागीदारी बढ़ सकती है। व्यापारिक जानकारी समझा सकती है, दस्तावेज तैयार करने में सहायता कर सकती है, ग्राहक सेवा को सरल बना सकती है, छोटे व्यवसाय के लिए विज्ञापन और प्रचार सामग्री तैयार करने में सहायता कर सकती है।
इस प्रकार हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं रहेगी, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की भाषा भी बन सकती है। लेकिन अक के दौर में हिंदी के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं। AI हिंदी के लिए अवसर है, लेकिन यह चुनौती से मुक्त नहीं है। अक की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पास किस भाषा में कितना अच्छा और विविध डेटा उपलब्ध है। अंग्रेजी में लंबे समय से विशाल डिजिटल सामग्री मौजूद है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है।
हमें हिंदी में गुणवत्तापूर्ण पुस्तकें, शोधपत्र, पाठ्य सामग्री, विश्वसनीय वेबसाइटें, वैज्ञानिक सामग्री, कानूनी दस्तावेज, डिजिटल अभिलेख, लोक साहित्य और भाषाई संसाधन बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने होंगे। इसके साथ एक और चुनौती है हिंदी की विविधता। हिंदी केवल मानक हिंदी नहीं है। इसके साथ भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका, छत्तीसगढ़ी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, हरियाणवी और अनेक लोकभाषाओं तथा बोलियों की समृद्ध परंपरा जुड़ी है। यदि एआई इन भाषाई विविधताओं को समझ सके, तो भारत की भाषाई संस्कृति को नयी डिजिटल शक्ति मिल सकती है।
जब कोई जापानी अपनी भाषा में बोलता है तो वह अपनी भाषा के कारण छोटा नहीं होता। जब कोई फ्रांसीसी अपनी भाषा में संवाद करता है तो उसकी प्रतिष्ठा कम नहीं होती। जब चीन अपनी भाषा में विज्ञान और तकनीक का निर्माण कर सकता है तो भारत क्यों नहीं? हमारी योग्यता हमारे ज्ञान, विचार, व्यवहार, रचनात्मकता और कर्म से तय होती है। हमें अंग्रेजी सीखनी चाहिए, दुनिया की अन्य भाषाएं भी सीखनी चाहिए, लेकिन अपनी भाषा बोलने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए।
दूसरी भाषा सीखना प्रगति है; अपनी भाषा को हीन समझना मानसिक गुलामी है। हिंदी को बचाने की नहीं, विकसित करने की जरूरत है। हिंदी दिवस की सार्थकता तभी होगी, जब हिंदी हमारे समारोहों से निकलकर हमारे व्यवहार, शिक्षा, शोध, तकनीक और भविष्य की निर्माण-प्रक्रिया का हिस्सा बने। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता, चिंतक और रंग निर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)