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प्रकृति संरक्षण से सतत विकास की राह

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प्रकृति संरक्षण से सतत विकास की राह
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कविता 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की पहचान जल, जंगल, जमीन और जानवर से गहरे जुड़े जीवन और संस्कृति से होती है। यहां के ग्रामीण और जनजातीय समुदायों की आजीविका, परंपराएं और सामाजिक जीवन लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रहे हैं। जंगल से मिलने वाले लघु वनोपज, खेती के लिए जमीन, जीवन और कृषि के लिए जल तथा पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए झारखंड में प्रकृति संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आजीविका, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। 

बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव, भूमि की उर्वरता में कमी, वनों पर बढ़ता दबाव, जैव विविधता में कमी तथा ठोस एवं तरल अपशिष्ट का बढ़ता प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। इन परिस्थितियों में विकास की ऐसी दिशा आवश्यक है जिसमें आर्थिक और सामाजिक प्रगति के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। 

इस दिशा में ग्राम पंचायतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। स्थानीय स्वशासन की सबसे निकटस्थ संस्था होने के कारण ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों और समुदाय की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को अलग गतिविधि के रूप में देखने के बजाय इसे ग्राम पंचायत विकास योजना और स्थानीय विकास की प्राथमिकताओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना आवश्यक है। 

ग्राम पंचायतें अपने क्षेत्र में उपलब्ध जलस्रोतों, भूमि, वन क्षेत्र, सामुदायिक संसाधनों, कृषि क्षेत्र और जैव विविधता की स्थिति का स्थानीय स्तर पर आकलन कर सकती हैं। तालाबों और पारंपरिक जलस्रोतों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र का विकास, भूमि संरक्षण, पौधरोपण एवं पौधों का संरक्षण, सामुदायिक भूमि और चारागाहों का संरक्षण तथा स्थानीय जैव विविधता की सुरक्षा जैसे कार्यों को पंचायत की विकास योजना में प्राथमिकता दी जा सकती है। 

प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तभी प्रभावी होगा जब स्थानीय समुदाय इसमें सक्रिय भागीदार बने। ग्राम सभा इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण मंच है। महिलाओं, युवाओं, किसानों, जनजातीय समुदायों और अन्य स्थानीय समूहों की भागीदारी से गांव की वास्तविक पर्यावरणीय समस्याओं और प्राथमिकताओं की पहचान की जा सकती है। ग्राम सभा के माध्यम से यह तय किया जा सकता है कि गांव के सामने जल संकट, भूमि क्षरण, वन संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन या आजीविका से जुड़ी कौन-सी चुनौती सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और उसके समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर क्या प्रयास किये जा सकते हैं। 

सतत विकास लक्ष्यों को भी स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ना आवश्यक है। गरीबी उन्मूलन, बेहतर आजीविका, स्वच्छ जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण, लैंगिक समानता, जलवायु कार्रवाई तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जैसे लक्ष्य गांव के विकास से सीधे जुड़े हैं। उदाहरण के लिए जल संरक्षण की एक पहल केवल पेयजल की उपलब्धता नहीं बढ़ाती, बल्कि कृषि, पशुपालन, आजीविका और पोषण की स्थिति को भी प्रभावित करती है। इसी प्रकार ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन से स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरण तीनों में सुधार संभव है। 

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्य किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं हैं। जल संरक्षण, ग्रामीण रोजगार, कृषि, पशुपालन, वन, आजीविका, स्वच्छता और पेयजल से संबंधित योजनाओं के बीच प्रभावी अभिसरण से पंचायतों की क्षमता और परिणाम दोनों बढ़ाए जा सकते हैं। ग्राम पंचायत अपनी विकास योजना में स्थानीय पर्यावरणीय प्राथमिकताओं की पहचान कर विभिन्न विभागों और योजनाओं के संसाधनों को उनसे जोड़ सकती है। इससे सीमित संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव होगा। 

हालांकि इस दिशा में ग्राम पंचायतों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। तकनीकी जानकारी और मानव संसाधन की कमी, सीमित वित्तीय संसाधन, विभागीय समन्वय की कठिनाइयां, पर्यावरणीय विषयों पर पर्याप्त जागरूकता का अभाव तथा योजनाओं के प्रभावी अनुश्रवण की सीमाएं प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं। जल संरक्षण, भूमि सुधार और जैव विविधता संरक्षण जैसे कार्यों का लाभ अक्सर लंबे समय में दिखाई देता है। इसलिए इनके लिए निरंतर प्रयास, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी आवश्यक है। आने वाले समय में विकास की सोच को केवल सड़क, नाली, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाओं तक सीमित रखने के बजाय प्राकृतिक संसाधनों की

दीर्घकालिक सुरक्षा से जोड़ना होगा। प्रत्येक ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार जल संरक्षण, हरित क्षेत्र का विस्तार, अपशिष्ट प्रबंधन, जलवायु अनुकूल कृषि, प्राकृतिक संसाधन आधारित आजीविका और जैव विविधता संरक्षण जैसी प्राथमिकताएं निर्धारित कर सकती है। इसके लिए पंचायत प्रतिनिधियों और पंचायत कर्मियों की क्षमता-वृद्धि, ग्राम सभा की प्रभावी भागीदारी, स्थानीय आंकड़ों का उपयोग और योजनाओं का नियमित अनुश्रवण महत्वपूर्ण होगा। 

झारखंड में सतत विकास की राह गांवों से होकर गुजरती है। जल बचेगा तो खेती और आजीविका मजबूत होगी, जंगल बचेगा तो प्राकृतिक संतुलन और स्थानीय अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहेगी, जमीन बचेगी तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा और पशुधन तथा जैव विविधता का संरक्षण ग्रामीण जीवन को अधिक टिकाऊ बनायेगा। इसलिए प्रकृति संरक्षण को विकास से अलग नहीं, बल्कि विकास की आधारभूत शर्त के रूप में देखने की आवश्यकता है। 

स्थानीय स्वशासन को मजबूत करते हुए यदि ग्राम पंचायतें अपनी विकास योजनाओं को पर्यावरण संरक्षण, ग्राम सभा की भागीदारी, विभागीय अभिसरण और सतत विकास लक्ष्यों के स्थानीयकरण से जोड़ें, तो गांवों में ऐसा विकास मॉडल तैयार किया जा सकता है जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखे। यही झारखंड के गांवों को अधिक समृद्ध, स्वस्थ, समावेशी और सतत बनाने की दिशा में एक सार्थक कदम होगा। (लेखक राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान पंचायती राज मंत्रालय की क्षमता निर्माण सलाहकार हैं।)

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